August 24, 2018



कुछ शब्द रोज़मरहा की ज़िन्दगी से लुप्त हो रहे है।

तो क्या उनकी जगह कोई और नये शब्द ले रहे है

या फिर वो अभिव्यक्ति ही गुम हो रही है?!

March 03, 2018

बीते लम्हे


बिलकुल
आसमाँ में तारे जितने
बीते लम्हे उतने

कुछ हरदम टिमटिमाते
बाकी जाने क्यों नज़र नहीं आते
छुपे ही सही पर होते ज़रूर

कहने अपनी कहानी समय पर
बारी-बारी जग जाते सारे
दबे छुपे टिमटिमाते

बीत तो जाते
पर साथ ही रहते
दबे पाँव ऊँगली को थामे

ख़ुशी आँसू
रूमानी और नूरानी अनुभव
बिन आवाज़ भिखेरते रहते 

काली रात ख़ामोशी के साथ
मुझ में उतरते समा से जाते
चुपकेसे मौजूद बन जाते ये लम्हे

January 28, 2018


एक और खो गया


एक और
और एक
खो गया
बाज़ार में

चका चौंध
शोर गुल
सुख के
गुब्बारे में

खो गया
बाजार में

कड़े सुर
तीखी ज़ुबान
अटल विश्वास
कड़वा अंदाज़

खो गया
बाजार में

लड़ाई संघर्ष
निडर विरोध
अलग आवाज़
हाथ में हाथ  

खो गया
बाजार में

एक और
और एक
खो गया
बाजार में

September 29, 2017


समाज या बाज़ार

टॉलरेंस, मौलिक अधिकार
धर्म निरपेक्ष, नागरिकत्व
न्याय, जनतंत्र, संविधान 
ये खोकले शब्द है या मूल्य

ऊँची ऊँची इमारतों में
लम्बे लम्बे फ्लाईओवर तले
दौड़ती मेट्रो की पटरियों के नीचे
ये हो रहे है दफ़न

बन रहा है इनका मज़ाक
बेचा जा रहा है इन्हे
ख़बरों में, कार्यक्रमो में 
ज़ोर ज़बरदस्ती और पिस्तौल से

मुनाफा और सत्ता
की बुआई हो रही है
कैसे रिश्ता बना रहे है
कैसा समाज चाह रहे है

July 01, 2017


मेरे मन के कोने में जो अँधेरा है
क्या वो भी स्याह है
या कोई तारा टिमटिमा रहा है
फिर नज़र क्यों नहीं आ रहा है

June 16, 2017


आज़ादी

हम हो गए आज़ाद
बस कुछ थोड़ा ही काम बाकी है

विकास की दौड़ जारी है
देशभक्ति की यही तो निशानी है 

महिला पर हिंसा
अभी भी ये जारी है

दलितों के साथ अन्याय
ये तो जाती की नाड़ी है

मज़दूरों पर अत्याचार
मुनाफ़े कमाई की चाबी है 

छोटे किसानो की बढ़ती आत्महत्या
बुलेट ट्रैन हॉर्न बजाती है

दंगो में मारे जाना
एक बड़ी राजनीती है

जंगल से खदेड़े जाना
चतुर सियार की नीति है

बस्तियों का उजाड़े जाने
खोकली सुंदरता की काली तस्वीर है 

विकास की दौड़ जारी है
बस कुछ थोड़ा ही काम बाकी है

हम हो गए आज़ाद
देशभक्ति की यही तो निशानी है

April 29, 2017

सबसे ख़तरनाक होता है...

- पाश

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती
बैठे-बिठाए पकड़े जाना बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता
कपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है
जुगनुओं की लौ में पढ़ना
मुट्ठियां भींचकर बस वक्‍त निकाल लेना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता

सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होना
सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना
सबसे ख़तरनाक वो घड़ी होती है
आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो
आपकी नज़र में रुकी होती है

सबसे ख़तरनाक वो आंख होती है
जिसकी नज़र दुनिया को मोहब्‍बत से चूमना भूल जाती है
और जो एक घटिया दोहराव के क्रम में खो जाती है
सबसे ख़तरनाक वो गीत होता है
जो मरसिए की तरह पढ़ा जाता है
आतंकित लोगों के दरवाज़ों पर
गुंडों की तरह अकड़ता है
सबसे ख़तरनाक वो चांद होता है
जो हर हत्‍याकांड के बाद
वीरान हुए आंगन में चढ़ता है
लेकिन आपकी आंखों में
मिर्चों की तरह नहीं पड़ता

सबसे ख़तरनाक वो दिशा होती है
जिसमें आत्‍मा का सूरज डूब जाए
और जिसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा
आपके जिस्‍म के पूरब में चुभ जाए
मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती