October 27, 2012

खुरपी


एक बूढ़े काका और उनकी पत्नी का कहना:
हमारा परिवार करीब 30 साल से खुरपी इस्तेमाल कर रहा है। हम हर बार शौच को खेत में जाते और खुरपी हमारे साथ होती। 
गांधीजी की एक किताब पढ़ी जिसमे इसका ज़िक्र था। मुझे ये बात भा गयी। सो मैंने खुरपी को अपना लिया। और परिवार के सभी लोगों ने भी इसे अपना लिया।
हमारी बेटी जब ब्याह कर गयी तो वहां पर भी यही तरीका अपना लिया गया।

उनका बेटा बोला:

हमारे दोस्त हस्ते थे, मजाक उड़ाते थे। उन्हें कौन समझाता। वो थोड़ी ही सुनते। हम क्या करते ये बता दिया और उन पर छोड़ दिया - अपनाये या नहीं ये उनकी मर्ज़ी। 
हम तो आज भी खुरपी ले जाते है और गर्व से बोला मेरी पत्नी और बच्चे भी खुरपी लेकर जाते है।

उनका कहना:
 
गाव में, घर में शौचालय होना ये तो नया फैशन है। हमें इससे कोई ऐतराज़ नहीं। जो जैसा चाहे करे, बात तो सिर्फ इतनी है की पैखाना खुला न हो, उस पर मक्खी न बैठे और बीमारी न फैले। फिर चाहे शौचालय में जाये या फिर खुरपी लेकर खेत में। बस टट्टी पर मट्टी ही तो डालना है।
डर लगता है

खुली आंख का
मुंदी आंख का

घर का
बाज़ार का

अपनों का
परायों का

दोस्तों का
दुश्मनों का

दिन का
रात का

हसने का
रोने का

ख़ुशी का
दुःख का

अकेले होने का
किसी के साथ होने का

सुनने का
देखने का

यादों का
सपनो का

चुनने का
चुने जाने

वादों का
इरादों का

समझने का
अनजान रहने का

चुप रहने का
कुछ कहने का

ख़रीदे जाने का
बीक जाने का

वजूद होने का
वजूद खोने का


डर लगता है