November 17, 2012

गुफ्तगू

एक बच्चे के साथ बिताये कुछ मज़ेदार पल।


जीजू ने बच्चे से पूछा पत्तों का खेल खेलोगे? बच्चा फटाफट राज़ी हो गया।
शर्त लगी की अगर वो पत्तों को कहे अनुसार लगा देता है तो मुह माँगा इनाम पायेगा।
बच्चा ख़ुशी ख़ुशी पत्तों के बीच खो गया। एक से दस तक उन्हें जोड़ने लगा।
करीब 20 मिनट तक उसे दुनिया की कोई खबर नहीं रही।
 काम पूरा होते ही बच्चा बेसब्री से जीजू को बुलाने लगा।
जीजू आये और उसका पूरा काम देखे उसके बीच में 
बच्चा बाकी लोगों से कहता है, "क्या मांगू, मैं?" और सोच में डूब जाता है।
जीजू आने पर छाती चौड़ी कर किया हुआ काम दिखता है।
मौजूद सभी बड़े ताली बजाकर उसका उत्साह बढ़ाते है। 
अब जीजू उसे पूछते है बोलो क्या लोगे।
बच्चा बड़ी समझदारी के साथ कहता है, "जो आप देना चाहो"।
और पूछने पर सादगी से बोलता है, "बस, बैगन की सब्जी खाने की ज़बरदस्ती कोई न करें।"


छोटे छोटे सपने
सादगी भरी इच्छाएं
बच्चे बड़ों से सीखे
या फिर बड़े बच्चों से सीखे

November 08, 2012

अच्छा
या
सच्चा


आसान
या
मुश्किल
 
साथ
या
अकेले
 
मक़ाम
या
राह

सुलझना
या
उलझना
 
जवाब
या
सवाल
 
बनाना
या
तोडना

जीत
या
हार
 
दिमाग
या
दिल
 
तनका
या
मनका

मेरा
या
सबका
 
नौकरी
या
काम
 
दौड़
या
आराम

ख़ास
या
आम
 
सरकार
या
समाज
 
देश
या
इंसान

जिंदा
या
जीवित

November 03, 2012

एक राह
कुछ
कच्ची पक्की
कुछ सीधी टेढ़ी

कई राही
कुछ दौड़ते भागते
कुछ भीड़ में खो जाते

एक दिन
राह ने पुछा
राही से

इस तरह
दौड़ दौड़ के
कहाँ जा रहे हो ?

क्यों
मुझे पीछे
छोड़े जा रहे हो?

राही ने
मानो सुना
ही नहीं

कुछ देर हुई
राह
फिर बोली

ये दौड़
कहाँ
के लिए है ?

राही
अपने कदम 
तेज़ी से बढ़ाने लगा

राह को
अब भी नहीं समझा
की क्या हो रहा है

थके हांफते राही को देख  
कुछ देर बाद
राह फिर बोली

कुछ दम ले लो
इस मोड़ पर थम लो
आखिर इतनी जल्दी क्या है

एक दो
सौ दोसो
हजारों

जाने कितने ही
राही
बस गुजरते चले गए

October 27, 2012

खुरपी


एक बूढ़े काका और उनकी पत्नी का कहना:
हमारा परिवार करीब 30 साल से खुरपी इस्तेमाल कर रहा है। हम हर बार शौच को खेत में जाते और खुरपी हमारे साथ होती। 
गांधीजी की एक किताब पढ़ी जिसमे इसका ज़िक्र था। मुझे ये बात भा गयी। सो मैंने खुरपी को अपना लिया। और परिवार के सभी लोगों ने भी इसे अपना लिया।
हमारी बेटी जब ब्याह कर गयी तो वहां पर भी यही तरीका अपना लिया गया।

उनका बेटा बोला:

हमारे दोस्त हस्ते थे, मजाक उड़ाते थे। उन्हें कौन समझाता। वो थोड़ी ही सुनते। हम क्या करते ये बता दिया और उन पर छोड़ दिया - अपनाये या नहीं ये उनकी मर्ज़ी। 
हम तो आज भी खुरपी ले जाते है और गर्व से बोला मेरी पत्नी और बच्चे भी खुरपी लेकर जाते है।

उनका कहना:
 
गाव में, घर में शौचालय होना ये तो नया फैशन है। हमें इससे कोई ऐतराज़ नहीं। जो जैसा चाहे करे, बात तो सिर्फ इतनी है की पैखाना खुला न हो, उस पर मक्खी न बैठे और बीमारी न फैले। फिर चाहे शौचालय में जाये या फिर खुरपी लेकर खेत में। बस टट्टी पर मट्टी ही तो डालना है।
डर लगता है

खुली आंख का
मुंदी आंख का

घर का
बाज़ार का

अपनों का
परायों का

दोस्तों का
दुश्मनों का

दिन का
रात का

हसने का
रोने का

ख़ुशी का
दुःख का

अकेले होने का
किसी के साथ होने का

सुनने का
देखने का

यादों का
सपनो का

चुनने का
चुने जाने

वादों का
इरादों का

समझने का
अनजान रहने का

चुप रहने का
कुछ कहने का

ख़रीदे जाने का
बीक जाने का

वजूद होने का
वजूद खोने का


डर लगता है