November 11, 2016




हम भी इंसान
तुम भी इंसान
क्या अफसर
क्या जंगलवासी

तुम्हारा बॉक्साइट
हमारा भगवन
तुम्हारे लिए पानी
हमारा जीवन दान

लाठी गोली तुम्हारे साथी
बहता झरना हमारे गीत
गाड़ी - यूनिफार्म तुम्हारी ताकत
साथ में जीना हमारी हिम्मत

कागज़ कलम काले अक्षर
क्या उनकी औकात?
जब बजते हमारे चांगु - ताशे
जब गूंजती पैरो की आवाज़

कागज़ - रुपैये से क्या बहलाओगे
खड़ा हमारे साथ पेड़-पहाड़
कांधमाल में चल रहा संघर्ष
साथ खड़ा है बस्तर

हम भी इंसान
तुम भी इंसान
क्या अफसर
क्या जंगलवासी

रुकावट नहीं किसी तरह की
साथ जो बैठो दोस्त बनकर
गर जो आते ज़मीन के वास्ते
पानी, पहाड़, जंगल के रास्ते

एक कदम न पड़ने देंगे
एक पेड़ न कटने देंगे
नहीं खोदने देंगे पहाड़
नहीं हम देंगे, नहीं हम देंगे
चाहे कर लो जितने वार


- यह कविता कार्यशाला के दौरान सहभागियों के साथ मिलकर बनायीं गयी 

October 15, 2016




कैसा गजब का नाता है
दिलो-दिमाग पर छा जाता है
कौन किसके बस में है
क्या ये पता चल पाता है

कभी मन की कहता है
तो कभी मन को कहता है
जानकारी-मनोरंजन या फिर विज्ञापन...
पैसे लेकर या मुफ्त ही लुभाता है

क्या उसकी अपनी कोई भाषा है
स्वयं कहता... या कोई कहलवाता है
जानना-समझना है, विश्लेषण करना है
उपभोगता क्यों, हमें उत्पादक बनना है


प्रबीर और अंजु

October 08, 2016

तुम देखकर सीख लेना


अगर चाहो तो आ जाओ, जान लो
खोज लिए है मैंने सवालों के जवाब

आत्मनिर्भर व्यक्ति, सशक्त समाज का निर्माण
क्या कर पाएंगे, हम दे दे कर जवाब

एक दीदी का था जवाब:
हम कैसे सिखाएंगे करना खेती
हम तो है किसान
हम करेंगे खेती
तुम देखकर सीख लेना

November 25, 2015

वक़्त वक़्त की बात


वक़्त बस गुज़र जाता
वो कब हाथ आता

यादों के रूप में
अपनी छाप छोड़ जाता

अब तक ये जाना
सदियों से इसे माना

पर कुछ पल के लिए ही सही 
गर वक़्त वही थम जाये

आगे बढ़ने से इंकार करे 
और उसी घडी में जम जाये 

ये नफरत फ़साद भरा मौहाल
ये लूट दबोच की गर्मी

ये मेरा तेरा अपना उसका
सब से हम और फिर सिर्फ मैं

यही आज कल परसों
हर पल कई बरसों

वक़्त 
​कहाँ ​
गुज़रता जाता है
कहानी वही दोहराता है

May 20, 2015




"पोथी पढ़कर जग मुआ, पंडित भया न कोई"


क्या हम अपना खाना खुद उगाते है?
क्या हम अपना खाना उगा सकते है?

क्या हम अपना खाना खुद पकाते है?
क्या हम अपना खाना पका सकते है?

क्या हम अपना कपडा बूनते है?
क्या हम अपना कपडा बून सकते है?

क्या हम अपना घर खुद बनाते है?
क्या हम अपना घर बना सकते है?

क्या हम जानते है हमारे घर के नल में पानी कहाँ से आता है?
क्या हम जानते है की जो अनाज सब्ज़ी फल हम खाते है कहाँ से आते है?

क्या हम जानते है की जो बिजली हमारे घर को रोशन करती है वो कहाँ से आती है?
क्या हम जानते है की हमारी इन ज़रूरतों के लिए कौन श्रम करते रहे है?

क्या हम उनसे कभी मिले है?
क्या हम उन्हें अपने परिवार का हिस्सा मानते है?