April 23, 2017

मुलाक़ात


इस भाग दौड़ की ज़िन्दगी में 
फिर मुलाक़ात हुई, दोराह पर

हमेशा की तरह मैं ने कुछ कहा, उसने अपनी कही 
फिर हम चल दिए अपनी-अपनी राह

हर बार की मुलाक़ात, बस अब इतनी ही होती
नज़र से नज़र मिलती, आँख मूंद लेती

याद है वो दिन, जब मैं और खुद साथ होते
और होते खेल, गप्पे, कहानियाँ और अनगिनत राज़

फिर कुछ ऐसा घटता गया
जो मुझे खुद से, दूर करता गया

शायद ज़िन्दगी के खेल की जीत हुई
मैं और खुद, दो व्यक्ति हुई

खुद अब भी दो राहे पर खड़ी है
इंतज़ार कर रही है, मेरा

November 20, 2016


... सारा मुल्क पंसारी की दूकान बन गया है
मालूम न था इतना कुछ है घर में बेचने के लिए
ज़मीन से लेकर ज़मीर तक सब बिक रहा है
- ग़ालिब

November 11, 2016




हम भी इंसान
तुम भी इंसान
क्या अफसर
क्या जंगलवासी

तुम्हारा बॉक्साइट
हमारा भगवन
तुम्हारे लिए पानी
हमारा जीवन दान

लाठी गोली तुम्हारे साथी
बहता झरना हमारे गीत
गाड़ी - यूनिफार्म तुम्हारी ताकत
साथ में जीना हमारी हिम्मत

कागज़ कलम काले अक्षर
क्या उनकी औकात?
जब बजते हमारे चांगु - ताशे
जब गूंजती पैरो की आवाज़

कागज़ - रुपैये से क्या बहलाओगे
खड़ा हमारे साथ पेड़-पहाड़
कांधमाल में चल रहा संघर्ष
साथ खड़ा है बस्तर

हम भी इंसान
तुम भी इंसान
क्या अफसर
क्या जंगलवासी

रुकावट नहीं किसी तरह की
साथ जो बैठो दोस्त बनकर
गर जो आते ज़मीन के वास्ते
पानी, पहाड़, जंगल के रास्ते

एक कदम न पड़ने देंगे
एक पेड़ न कटने देंगे
नहीं खोदने देंगे पहाड़
नहीं हम देंगे, नहीं हम देंगे
चाहे कर लो जितने वार


- यह कविता कार्यशाला के दौरान सहभागियों के साथ मिलकर बनायीं गयी 

October 15, 2016




कैसा गजब का नाता है
दिलो-दिमाग पर छा जाता है
कौन किसके बस में है
क्या ये पता चल पाता है

कभी मन की कहता है
तो कभी मन को कहता है
जानकारी-मनोरंजन या फिर विज्ञापन...
पैसे लेकर या मुफ्त ही लुभाता है

क्या उसकी अपनी कोई भाषा है
स्वयं कहता... या कोई कहलवाता है
जानना-समझना है, विश्लेषण करना है
उपभोगता क्यों, हमें उत्पादक बनना है


प्रबीर और अंजु

October 08, 2016

तुम देखकर सीख लेना


अगर चाहो तो आ जाओ, जान लो
खोज लिए है मैंने सवालों के जवाब

आत्मनिर्भर व्यक्ति, सशक्त समाज का निर्माण
क्या कर पाएंगे, हम दे दे कर जवाब

एक दीदी का था जवाब:
हम कैसे सिखाएंगे करना खेती
हम तो है किसान
हम करेंगे खेती
तुम देखकर सीख लेना