March 03, 2018

बीते लम्हे


बिलकुल
आसमाँ में तारे जितने
बीते लम्हे उतने

कुछ हरदम टिमटिमाते
बाकी जाने क्यों नज़र नहीं आते
छुपे ही सही पर होते ज़रूर

कहने अपनी कहानी समय पर
बारी-बारी जग जाते सारे
दबे छुपे टिमटिमाते

बीत तो जाते
पर साथ ही रहते
दबे पाँव ऊँगली को थामे

ख़ुशी आँसू
रूमानी और नूरानी अनुभव
बिन आवाज़ भिखेरते रहते 

काली रात ख़ामोशी के साथ
मुझ में उतरते समा से जाते
चुपकेसे मौजूद बन जाते ये लम्हे

January 28, 2018


एक और खो गया


एक और
और एक
खो गया
बाज़ार में

चका चौंध
शोर गुल
सुख के
गुब्बारे में

खो गया
बाजार में

कड़े सुर
तीखी ज़ुबान
अटल विश्वास
कड़वा अंदाज़

खो गया
बाजार में

लड़ाई संघर्ष
निडर विरोध
अलग आवाज़
हाथ में हाथ  

खो गया
बाजार में

एक और
और एक
खो गया
बाजार में

September 29, 2017


समाज या बाज़ार

टॉलरेंस, मौलिक अधिकार
धर्म निरपेक्ष, नागरिकत्व
न्याय, जनतंत्र, संविधान 
ये खोकले शब्द है या मूल्य

ऊँची ऊँची इमारतों में
लम्बे लम्बे फ्लाईओवर तले
दौड़ती मेट्रो की पटरियों के नीचे
ये हो रहे है दफ़न

बन रहा है इनका मज़ाक
बेचा जा रहा है इन्हे
ख़बरों में, कार्यक्रमो में 
ज़ोर ज़बरदस्ती और पिस्तौल से

मुनाफा और सत्ता
की बुआई हो रही है
कैसे रिश्ता बना रहे है
कैसा समाज चाह रहे है

July 01, 2017


मेरे मन के कोने में जो अँधेरा है
क्या वो भी स्याह है
या कोई तारा टिमटिमा रहा है
फिर नज़र क्यों नहीं आ रहा है

June 16, 2017


आज़ादी

हम हो गए आज़ाद
बस कुछ थोड़ा ही काम बाकी है

विकास की दौड़ जारी है
देशभक्ति की यही तो निशानी है 

महिला पर हिंसा
अभी भी ये जारी है

दलितों के साथ अन्याय
ये तो जाती की नाड़ी है

मज़दूरों पर अत्याचार
मुनाफ़े कमाई की चाबी है 

छोटे किसानो की बढ़ती आत्महत्या
बुलेट ट्रैन हॉर्न बजाती है

दंगो में मारे जाना
एक बड़ी राजनीती है

जंगल से खदेड़े जाना
चतुर सियार की नीति है

बस्तियों का उजाड़े जाने
खोकली सुंदरता की काली तस्वीर है 

विकास की दौड़ जारी है
बस कुछ थोड़ा ही काम बाकी है

हम हो गए आज़ाद
देशभक्ति की यही तो निशानी है