April 17, 2020

लोगों का राज, लोगों द्वारा, लोगों के लिए


क्या गड़बड़ 
क्या घोटाला 
चाबी में है ताला 

संविधान का कहना है क्या
लोकतंत्र है क्या
सरकार और जनता का रिश्ता हो क्या

आदेश दे कौन 
आदेश का पालन करे कौन
नियोजन और कार्य प्रगति की पूरी सूचना हो किसे

क्या नियमनुसार चल रहा है सबकुछ
क्या प्रजा को है सब पता
क्या सब प्रजा को सब पता है 

September 07, 2019


इन बिगड़ते हालात का
बयान क्या करें 
सब्र और संघर्ष 
उम्मीद और आक्रोश 
के मौसम साथ हो लिए  

क्यों कर आख़िर 
ये रंग इतना बदल गया 
खान-पान का असर 
आखिरकार हो ही गया 

बात ये शाकाहारी मांसाहारी 
की बना दी गयी 
जबके असल गुन्हेगार तो 
विकास-ए-ताज से सम्मानित गए 

क्यों नहीं देख पाए हम 
की बेमौसमी सुन्दर दिखनेवाली 
सब्ज़ियां और फल बाजार में ही नहीं 
हमारे दिल और दिमाग पर छा जायेंगे 

हम इंसान न रहकर 
फरेब के नकाब पहनकर 
बाज़ार में बिकते 
सामान से बन जायेंगे

August 24, 2018



कुछ शब्द रोज़मरहा की ज़िन्दगी से लुप्त हो रहे है।

तो क्या उनकी जगह कोई और नये शब्द ले रहे है

या फिर वो अभिव्यक्ति ही गुम हो रही है?!

March 03, 2018

बीते लम्हे


बिलकुल
आसमाँ में तारे जितने
बीते लम्हे उतने

कुछ हरदम टिमटिमाते
बाकी जाने क्यों नज़र नहीं आते
छुपे ही सही पर होते ज़रूर

कहने अपनी कहानी समय पर
बारी-बारी जग जाते सारे
दबे छुपे टिमटिमाते

बीत तो जाते
पर साथ ही रहते
दबे पाँव ऊँगली को थामे

ख़ुशी आँसू
रूमानी और नूरानी अनुभव
बिन आवाज़ भिखेरते रहते 

काली रात ख़ामोशी के साथ
मुझ में उतरते समा से जाते
चुपकेसे मौजूद बन जाते ये लम्हे

January 28, 2018


एक और खो गया


एक और
और एक
खो गया
बाज़ार में

चका चौंध
शोर गुल
सुख के
गुब्बारे में

खो गया
बाजार में

कड़े सुर
तीखी ज़ुबान
अटल विश्वास
कड़वा अंदाज़

खो गया
बाजार में

लड़ाई संघर्ष
निडर विरोध
अलग आवाज़
हाथ में हाथ  

खो गया
बाजार में

एक और
और एक
खो गया
बाजार में